बाजरा (Pennisetum glaucum)

बाजरा (Pennisetum glaucum)

कुल ग्रेमिनी – (नया नाम – पोएसी )

Pearl millet या गरीब का भोजन (poor man’s food) के नाम से भी जाना जाता है।

उत्पत्ति – अफ्रिका

गुणसूत्र – 2n=14

बाजरा पर परागित (Cross pollinated) व प्रोटोगायनी फसल है।

हाइब्रिड बाजरा उत्पादन में नर बाध्य पंक्ति के लिए Tift- 23 A जीन काम में लेते है।

बाजरे का पुष्पकम स्पाईकलेट एवं इसका बीज कैरिऑप्सिस प्रकार का होता है।

मोटे दाने वाले खाद्यानों (Coarce cereals) में बाजरे का प्रमुख स्थान है।

बाजरे में 11.5% प्रोटीन, 67 % कार्बोहाइड्रेट एंव 2.7% खनिज लवण (अनाजों में सर्वोधिक) पाये जाते है। बाजरें में अनाजों में सबसे अधिक 5% तक वसा पाई जाती है।

बाजरे की फसल की वृद्धि के लिए 25-30 °C तापमान उचित रहता है।

सभी अनाजों एवं मिलेटस में बाजरे में सर्वोधिक सूखा सहन करने की क्षमता होती है।

बाजरे की फसल की जलमांग सबसे कम (250-300mm) होती है। देश में बाजरा के क्षेत्रफल व उत्पादन में राजस्थान का प्रथम स्थान है।

राजस्थान में क्षेत्रफल में बाड़मेर तथा उत्पादन में अलवर जिले का प्रथम स्थान है।

यह C. लघु दिवस प्रभावी (SDP) पौधा है।

बाजरे की फसल के लिए अच्छी जल निकास वाली बलुई दोमट मिटटी ठीक रहती है।

बीज-

सीधी बुआई हेतु 4-5Kg/ha.

नर्सरी तैयार कर रोपाई हेतु (for transplanting) 2kg/ha.

पौधो की संख्या 1,66000 प्रति हेक्टेयर

 उन्नत किस्में (Varieties)

पूसा मोती -ICAR द्वारा निकाली गई पुरानी किस्म है। 

संकर किस्में –

सन् 1965 में PAU, लुधियाना से HB-1 (हाइब्रिड बाजरा-1) विकसित प्रथम हाइब्रिड किस्म है।

असिंचित एवं पश्चिमी राजस्थान के लिए उपयुक्त किस्में HHB-67(I), RHB-173, 177, 226, MPMH-17, 21, MH-179,Raj-171

सिंचित एवं मध्य पूर्वी राजस्थान के लिए उपयुक्त किस्में RHB-223, RHB-233, RHB-234 

खरपतवार प्रबन्ध-

बंरू, जंगली चोलाई, दूबघास, मौथा, गोखरू आदि । 

बुआई के बाद लेकिन अंकुरण से पूर्व एट्राजीन 1Kg/ha. का प्रयोग करें । –

रूखंडी (Striga) बाजरे का अर्द्ध जड़ परजीवी खरपतवार है जिसके

नियंत्रण हेतु

2, 4-D @500 gram ai /ha. बुआई के 15 दिन बाद में प्रयोग करें।

थायोयुरिया का प्रयोग-

बारानी फसले जैसे-बाजरा, मक्का, सरसों, मूंग, जौ एवं गैहू में 10-15 प्रतिशत अधिक पैदावार बढाने हेतु बीजों को बुआई पूर्व आधा ग्राम थायोयुरिया प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित या खडी फसल में एक ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से थायोयुरिया का छिडकाव किया जाता है।

थायोयुरिया में 36.8% नत्रजन एवं 42.11% सल्फर पायी जाती है।

रोग (Diseases)-

1. डाऊनी मिल्डयू (मृदुरोमिल फॅफूद) या हरित बाली रोग (Green ear disease)—

स्कलेरोस्पोरा ग्रेमिनिकोला कवक द्वारा होता है। इसे तुलासिता रोग या जोगिया रोग भी कहते है ।

यह रोग मृदा व बीज दोनों से फैलता है।

इस रोग की दो अवस्था होती है। 

(i) मृदुरोमिल आसिता अवस्था (downy mildew stage)

(ii) हरित बाली अवस्था (green car stage)

प्रारम्भिक अवस्था में अधिक आर्द्र स्थानों में बाजरे की पत्तियों की निचली सतह पर फफूंद की वृद्धी दिखाई देती है जो डाउनी मिल्डू कहलाती है बाद में बालीयां पत्तीयों के गुच्छे जैसी संरचना में बदल जाती है, जिसे हरित बाली अवस्था कहते है ।

नियंत्रण

बीज उपचार – मेटालेक्सिल (एप्रोन उसडी 35) नामक कवकनाशी 6 ग्राम प्रति किलो बीज से उपचारित कर बुआई करे।

खड़ी फसल में रिडोमिल या मेन्कोजेब का 2kg/ha. की दर से दो छिड़काव करें

2. अरगट/चिपका रोग-

क्लेवीसेप्स फ्युजिफोरमिस नामक कवक द्वारा होता है। यह बाजरे का प्रमुख रोग है।

अरगट का सामान्य अर्थ स्क्लेरोशियम (sclerotium) होता है।

इस रोग की भी दो अवस्थाए होती है- 

(i) मधु स्त्राव अवस्था ( honey dew stage)

(ii) स्क्लेरोशिया अवस्था (sclerotial stage)

सर्वप्रथम इस फफूद द्वारा शहद जैसा चिपचिपा पदार्थ दानों पर स्त्रावित होता है जो मधु स्त्राव अवस्था (honey dew stage) कहलाती है। बाद में ये शहद जैसा पदार्थ दानों पर चिपका रहता है तथा सूखने पर कठारे हो जाता है, जिसे स्कलेरोटिन या अरगोटिन एल्केलोयड कहते हैं। पशुओं में यह Ergotism नामक बीमारी पैदा करता है, जिससे पशुओं में गर्भपात हो जाता है। 

नियंत्रण:-

केप्टान या थॉयराम 3g/kg बीज को उपचारित करें।

 देर से बुआई ना करें। .

3- 4 साल का फसल चक्र अपनायें।

बाजरे के बीज को बोने से पहले 20% नमक के घोल से उपचारित करके साफ पानी से बीजों को धोकर बोये।

नोट- अरगट रोग के अलावा रिंजका में अमरबेल की रोकथाम, गेंहू में ईयर कोकल (seed gall) एवं गैहू के सेहू या टुण्डू रोग की रोकथाम के लिए भी बीजों को 20% नमक के घोल (brine solution) से उपचारित करते है।

कण्ड या काग्या रोग (Smut disease) –

टोलिस्पोरियम पेनिसिलेरी नामक कवक द्वारा।

लक्षण -सिटटो में इस रोग से प्रभावित दाने हरे गोलाकार बड़े आकार के हो जाते है बाद में काले चूर्ण में बदल जाते है।

यह एक मृदोढ़ रोग है जो मृदा द्वारा फैलता है। रोग रोधी किस्म पूसा मोती उगाये । विटावेक्स @ 0.25% का छिड़काव करें।

कीट (Insect )-

1. सफेद लट:- (Holotrichia consainguinea )

शस्य प्रबन्धन – प्रकाश पाश (light trap) द्वारा – गर्मियों में वर्षा होने के बाद पूरे गांव के कृषकों द्वारा अभियान के रूप में पेडो पर रात्रि के समय प्रकाश पाश लगाकर वयस्क बीटल को नष्ट करते है।

जैविक नियन्त्रण- मेटाराईजियम एनिसोप्लाई नामक फफूंद से बीज उपचार- क्लोथियोनिडिन 6 ग्राम प्रति किलो बीज या थायोमेक्थाजाम 30 एफएस दवा @ 5ml/kg seed का बुआई से पूर्व प्रयोग करें। 

दीमक (Odentotermes obesus):-

नियंत्रण खड़ी फसल में सिचांई के साथ 4 ली./हेक्ट. की – दर से क्लोरोपॉरीफॉस अथवा क्यूनालफॉस का प्रयोग करें।

कातरा / हैयर कैटर पिलर (Amsacta moori) –

खरीफ सीजन का बहुभक्षी कीट है, इसकी लटें खरीफ फसलों जैसे- बाजरा, मक्का, ज्वार, ग्वार, मूंग, मूंगफली के तनें व पत्तियों को नुकसान पहुँचाती है।

इस कीट की मादा अपने जीवन काल में 1500 तक अण्डे देती है।

लार्वा छः बार निर्मोचन (moulting) करती है।

लट का पूरा शरीर लाल-भूरे रंग के बालों से ढका रहता है। इसकी कोशित अवस्था (pupal stage) 9-10 माह तक में सुसुप्तावस्था में पडी रहती है। यह कीट एक वर्ष में सामान्यतः एक पीढी पूर्ण करता है।

 जमीन प्रबन्धन-

(i)शस्य प्रबन्धन-

प्रकाश पाश (light trap) के प्रयोग से वयस्क शलभ को पहली वर्षा होने के बाद आकृषित कर नष्ट करते है।

खेत के चारों और खाई (trench) खोदकर भी इस कीट की लटटो को खेत में आने से रोक सकते है।

खरीफ सीजन के बाद गहरी जुताई करने पर सुसुप्तावस्था में पडे कोषित (pupae) अवस्था जमीन से बाहर आ जाती है, जो सूर्य की घूप से नष्ट हो जाती है या चिडियां, मैना, बगुलें भक्षण कर लेते है ।

रासायनिक नियन्त्रण-

(ii)कीट का प्रकोप दिखाई देने पर मैलाथियान 5 प्रतिशत या क्युनोलफोस 1.5 प्रतिशत Dust का @ 25 kg/ha की दर से भुरकाव करें।

1. टिड्डा / फडका ( locust / grasshopper)

भारत में टिडडी की तीन प्रजाती पायी जाती है, जिसमें रेगिस्तानी टिडडी वनस्पति का सबसे विनाशकारी शत्रु है ।

रेगिस्तानी टिडडा – Schistocerca Gregario

इस कीट की 2 से 5वीं अवस्था ही नुकसान पहुँचाती है। यह कीट करोडों की संख्या में समूह बनाकर ओमान, अरब, अफगानिस्तान एवं पाकिस्तान आदि देशों से भारत में प्रवेश करता है इसलिए इसको अन्तर्राष्ट्रीय शत्रु के रूप में जाना जाता है।

टिड्डी केवल आक, नीम, धतूरा, जामुन, शीशम और अजीर को छोडकर सभी प्रकार की वनस्पति को खा जाती है।

इस कीट की मादा बलूई मिटटी 10 से 15 से.मी. गहराई में

50-150 के समूह में अण्डे देती है।

एक मादा अपने जीवन काल में 500 तक अण्डे देती है। टिड्डी वर्ष में दो बार ग्रीष्म एवं शरद ऋतु में अण्डे देती है।

नियन्त्रण-

टिड्डी के समूह शाम होते ही पहाड़ों की तलहटी एवं घाटियों में वनस्पति पर विश्राम करती है, जिसे फ्लेम थ्रोअर से नष्ट कर सकते है।

■ मैलाथियान 5 प्रतिशत पाउडर का @ 25Kg/ha की दर से . भुरकाव करें।

क्लोरपायरीफोस 50 ईसी दवा का छिडकाव करके भी इस कीट को नष्ट किया जस सकता है।

टिडडी प्रजनन वाले क्षेत्रों के चारों और खाई खोदकर उसमें मैलाथियान पाउडर डालकर भी उनके शिशुओं को नष्ट कर सकते है।

2. अन्य कीट- तना छेदक, ज्वार की प्ररोह मक्खी इत्यादि ।

उपज (yield) –

असिंचित 6 से 7 क्विं /हे. एंव सिंचित संकर 18-20 क्वि / हे. ।

विगत परिक्षाओं में पूछें गये महत्त्वपूर्ण प्रश्न-

1. बाजरे की पश्चिमी राजस्थान हेतु अनुशंषित संकर किस्म जो मण्डोर, जोधपुर से विकसित है- MPMH-17, MPMH-21

2. मध्य व पूर्वी राजस्थान के लिए बाजरा के लिए अधिसूचित संकर किस्म है- RHB-223, RHB-233, RHB-234

3. भारत में बाजरे की सबसे पहले कौनसी संकर किस्म विकसित की गयी – HB-1 किस्म 1965 में

4. हरित बाली रोग (green year disease) कौनसी फसल का महत्वपूर्ण रोग है- बाजरा 

5.कौनसे अनाज में सर्वोधिक वसा पायी जाती है- बाजरा (5%)

6. मृदुरोमिल आसिता (downy mildew) रोग कौनसे कवकनाशी से आसानी से नियत्रित किया जा सकता है- मेटालेक्सिल समूह रिडोमिल एवं एप्रोन एसडी-35 से।

2 Comments.

    1. हम आपके लिए जल्दी ही एग्रीकल्चर सुपरवाइजर का कोर्स लॉन्च कर रहे हैं।

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